Wednesday, January 9, 2019


                                                                   मेरी हरिद्वार यात्रा

बता चुके हैं कि कल हम हरिद्वार में थे और बिल्कुल अभी दिल्ली लौटे हैं। देहरादून जाना नहीं था पर बस यूँ ही लौटते हुए देहरादून से लौटने का मन किया। वैसे भी यह स्थान हरिद्वार से सिर्फ ४८ किमी ही दूर है। जैसे ही हरिद्वार से रायवाला की तरफ चलना शुरू ही किया था कि मीलों लम्बे जाम से मुठभेड़ हुई । मन इतना कसैला हो गया कि सोचा देर नहीं हुई है अभी भी, क्यों न लौट चलें... मेरी विचार तंद्रा को तोड़ा एक चौदह पंद्रह वर्षीय बालक ने जो हमसे नारियल की गिरी के टुकड़े खरीदने की गुहार लगा रहा था । पेट भरा था फिर भी सोचा कि पचास रुपये में अगर इस जाम की वजह भी पता चल जाए तो सौदा बुरा नहीं...! वजह जानकर सर पीट लिया हमने पर उससे पहले वहाँ के क्षेत्रीय नेताओं को पीटने का मन किया... पता चला कि आगे एक रेलवे क्रासिंग है और ट्रेन लगभग गुजर चुकी है तथा सड़क के पर्याप्त चौड़े न होने के कारण बारी बारी से वाहनों को गुजारा जा रहा है। दिल्ली और इलाहाबाद में रहते रहते हम रेलवे क्रासिंग की भीड़ भाड़ कबके भूल गए, पता ही न चला । खैर राम राम करते जाम खुल गया और हम राजाजी बाघ संरक्षण क्षेत्र से गुजरने लगे हालांकि वहाँ हाथी और गुलदार से बचने की चेतावनियां लिखी हुई थीं। आगे के रास्तों पर हमें सड़कों की दयनीयता के दर्शन हुए और हम अपने प्यारे यूपी को याद करने लगे। इस कहावत का मतलब भी पता चला कि कोई चीज तबतक बुरी है जबतक हमें उससे बुरी चीज नहीं मिलती । एक बात और , पूरे उत्तराखंड में सीएनजी फिलिंग स्टेशन न मिलने से ऐसा लग रहा था जैसे हमारी गाड़ी पेट्रोल से नहीं बल्कि हमारी शिराओं में बहते रक्त से चल रही हो , और वह भी दुगुनी रफ्तार से , ऊपर से सड़कों का यह हाल...! मगर जब देहरादून से आगे बढ़े तो जो प्राकृतिक सौंदर्य हमारे समक्ष अवतरित हुआ उसे देखकर हम अपने रक्त का बहना भी भूल गए। ऐसे सौंदर्य का मोल तो हमारे सम्पूर्ण शरीर के रक्त से भी नहीं चुकाया जा सकता, ऐसा हमें लगा। फिर हमें दर्शन हुए डाट काली टनल के जिसके बारे में कुछ सूचना हमें अब्दुस समीर शेख साहब से भी मिली जो इस प्रकार है...
"देहरादून-दिल्ली हाईवे पर बन के तैयार : डाटकाली टनल को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देश को समर्पित किया"
सालों से जब भी देहरादून से दिल्ली राजमार्ग की तरफ या फिर दिल्ली से देहरादून राजमार्ग की तरफ आवाजाही होती है तो वो जगह जहाँ सबसे ज्यादा मुसीबत का सामना आम जनता को करना पड़ता था वो था डाट काली मंदिर. अब तक यहाँ पर एक ही सुरंग थी और उसी पर दोनों और एक-एक करके आवाजाही होती थी जिससे हर दिन यहाँ घंटों तक जाम में फंसे रहना होता था और अगर सीजन की बात हो तो यहाँ जनता को पूरे-पूरे दिन फंसा रहना पड़ता था.
देखिए कैसे साफ नियत से सही विकास किया जाता है...
वर्ष 2015 में यहां नई सुरंग को स्वीकृति दी गई.
मई 2017 में सुरंग का काम शुरू हुआ.
लगभग 60 करोड़ रुपए की लागत से बन कर तैयार हुई.
करीब 340 मीटर लंबी यह प्रदेश की पहली डबल लेन सुरंग है.
इस परियोजना का काम मई 2019 तक पूरा होना था. 
कार्यदायी संस्था ने दिन रात काम करके परियोजना को अनुबंध से करीब 8 महीने पहले कार्य पूरा करके जनता को बड़ी राहत पहुंचाने का काम किया है. 
समय से पहले बनने के कारण 9 करोड़ रुपए की बचत भी हुई है. 
डाटकाली की नई टनल बनने के बाद राजमार्ग की दूरी 1.5 किलोमीटर कम हो गई है. 
इस सुरंग में दोनों तरफ से पैदल चलने के लिए फुटपाथ भी बनाया गया है.
टनल का नाम ई विश्वेश्वरैया के नाम पर रखा गया है.
ऐसा सौंदर्य हमें ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश) में देखने को मिला था... काश हमारी सरकारें हमारे देश के प्राकृतिक सौंदर्य का उचित संरक्षण करने हेतु जनता को प्रेरित कर सकें।

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